Thursday, 29 June 2017

Tonsils ke Gharelu Upay in Hindi by Jivan Ayurveda


टॉन्सिल (Tonsils) की समस्या के घरेलू उपाय By Jivan Ayurveda






गले के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ मांस की गांठ सी होती है जिसे हम टॉन्सिल कहते हैं | इनमें पैदा होने वाली सूजन को टॉन्सिलाइटिस कहा है | जीवन आयुर्वेदा टॉन्सिल (Tonsils) की समस्या के घरेलू उपाय | जीवन आयुर्वेदा Gharelu Upchar for Tonsils in Hindi /टॉन्सिल्स के घरेलू उपचार टॉन्सिल्स ठीक करने, गले की सूजन और गले का दर्द जड़ से ख़त्म करने का सबसे असरदार उपाय | Tonsils Remedy tonsil thik karne ke upay tonsil home remedy in hindi gale ka dard kaise thik kare by Jivan Ayurveda टॉन्सिल का घरेलू उपचार,टॉन्सिल का इलाज,tonsil ka ilaj,gale ke tonsils ka ilaj | Jivan Ayurveda



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Tuesday, 20 June 2017

Joint Pain ke Gharelu Upay in Hindi by Jivan Ayurveda


पहले दिन से ही घुटने दर्द, जोड़ दर्द से आराम | Relief from Joint Pain Jivan Ayurveda




पहले दिन से ही घुटने दर्द, जोड़ दर्द से आराम : जीवन आयुर्वेदा किसी भी तरह का जोड़ दर्द हो ठीक करने के लिए घरेलु उपाए : जीवन आयुर्वेदा किसी भी जोड़ में दर्द हो ठीक हो जायेगा : जीवन आयुर्वेदा


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Saturday, 17 June 2017

bhukh na lagna ke Gharelu Upay in Hindi by Jivan Ayurveda

अरुचि भूख न लगना की समस्या By Jivan Ayurveda




अगर भोजन में अरुचि है तो आप इस घरेलु नुस्खे का प्रयोग करके इसका लाभ उठा सकते है | जीवन आयुर्वेदा भूख न लगने का देसी घरेलु उपचार | जीवन आयुर्वेदा Bhookh Na Lagna or Iska Desi Upchaa |Bhookh Na Lagna - Jivan Ayurveda agar kisi ko bhojan mein aruchi hai or bhookh nahi lagti to aap yeh home remedy use kar sakti hai , अगर भोजन में अरुचि है तो आप इस घरेलु नुस्खे का प्रयोग करके इसका लाभ उठा सकते है |आजकल बच्चों और बड़ों मे भूख ना लगना एक आम समस्या हो गयी है. खाना खाने मे अरुचि पैदा होने के कई कारण हो सकते है. अनियमित दिनचर्या, सही समय पर खाना न खाने और बाजार का उल्टा सीधा खाने के कारण पाचन तंत्र कमजोर हो जाता है! खाना ठीक से न पचने के कारण अरुचि ये भूख न लगने की समस्या पैदा हो जाती है! तो आप भी अगर इसी प्राब्लम से परेशन है तो इस वीडियो के ज़रिए जानिए भूक बढ़ाने के घरेलू उपाय और नुस्खे भूख बढ़ाने के घरेलू उपचार, Loss Of Appetite- Home Remedies and tips, bhookh na lagne ka desi ilaj, भूख न लगने के देसी नुस्खे और उपाय, Ayurvedic treatment for loss of Appetite. Jivan Ayurveda This channel is completely educational based on personal studies. any ayurvedic remedies is also based on personal studies. Before implementing please take suggestion from doctor.एनोरेक्सिया(anorexia)या भूख न लगने के कारण लक्षण और घरेलू उपचार

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Sunday, 19 March 2017

Hair ke Gharelu Upay in Hindi by Jivan Ayurveda

बाल न टूटेंगे न झड़ेंगे, बालों को लम्बा और घना करने का अचूक उपाए | Jivan Ayurveda




बालों का झड़ना और बालों का झड़ना स्थायी रूप से रोकें, Stop Hair Fall and Hair Thinning Permanently बाल टूटना, झड़ना, गिरना, उम्र से पहले सफ़ेद होने का 100 साल पुराना नुस्खा जो डॉक्टर कभी नहीं बताते : जीवन आयुर्वेदा बालों का झड़ना और बालों का पतला होना आज पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए सबसे आम समस्याओं में से एक है। 21 वर्ष से कम आयु के 25% पुरुष बालों के झड़ने से पीड़ित हैं। और 45% महिलाएँ अपने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर बाल झड़ने से पीड़ित होती हैं। आइए हम इसके प्रमुख कारणों और इसे ठीक करने के बारे में बात करते हैं।

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Sunday, 19 February 2017

Surya Mamaskar by Jivan Ayurveda

Surya Namaskar-Sun Salutation Steps & Benefits

सूर्य नमस्कार योगासनों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, इसे सर्वांग व्यायाम भी कहा जाता है। केवल इसका ही नियमित रूप से अभ्यास व्यक्ति को सम्पूर्ण योग व्यायाम का लाभ पहुंचाने में समर्थ है। इसके अभ्यास से व्यक्ति का शरीर निरोग और स्वस्थ होकर तेजस्वी हो जाता है। 'सूर्य नमस्कार' स्त्री, पुरुष, बाल, युवा तथा वृद्धों के लिए भी उपयोगी बताया गया है।


सूर्य नमस्कार कब करें ?

समस्त यौगिक क्रियाऒं की भाँति सूर्य-नमस्कार के लिये भी प्रातः काल सूर्योदय का समय सर्वोत्तम माना गया है। सूर्यनमस्कार सदैव खुली हवादार जगह पर कम्बल का आसन बिछा खाली पेट अभ्यास करना चाहिये।इससे मन शान्त और प्रसन्न हो तो ही योग का सम्पूर्ण प्रभाव मिलता है।

सूर्यनमस्कार क्यों करें ?


सूर्य-नमस्कार के नियमित अभ्यास से शारीरिक और मानसिक स्फूर्ति की वृद्धि के साथ विचारशक्ति और स्मरणशक्ति भी तीव्र होती है। इसके अन्य कई लाभ हैं जो निम्नलिखित हैं :

  • सभी महत्त्वपूर्ण अवयवोंमें रक्तसंचार बढता है।
  • सूर्य नमस्का‍र से विटामिन-डी मिलता है जिससे हड्डियां मजबूत होती हैं।
  • आँखों की रोशनी बढती है।
  • शरीर में खून का प्रवाह तेज होता है जिससे ब्लड प्रेशर की बीमारी में आराम मिलता है।
  • सूर्य नमस्कार का असर दिमाग पर पडता है और दिमाग ठंडा रहता है।
  • पेटके पासकी वसा (चरबी) घटकर भार मात्रा (वजन) कम होती है जिससे मोटे लोगों के वजन को कम करने में यह बहुत ही मददगार होता है।
  • बालों को सफेद होने झड़ने व रूसी से बचाता है।
  • क्रोध पर काबू रखने में मददगार होता है।
  • कमर लचीली होती है और रीढ की हडडी मजबूत होती है।
  • त्वचा रोग होने की संभावना समाप्त हो जाती है।
  • हृदय व फेफडोंकी कार्यक्षमता बढती है।
  • बाहें व कमरके स्नायु बलवान हो जाते हैं ।
  • कशेरुक व कमर लचीली बनती है।
  • पचनक्रियामें सुधार होता है।
  • मनकी एकाग्रता बढती है।
  • यह शरीर के सभी अंगों, मांसपेशियों व नसों को क्रियाशील करता है।
  • इसके अभ्यास से शरीर की लोच शक्ति में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है। प्रौढ़ तथा बूढे़ लोग भी इसका नियमित अभ्यास करते हैं तो उनके शरीर की लोच बच्चों जैसी हो जाती है।
  • शरीर की सभी महत्वपूर्ण ग्रंथियों, जैसे पिट्यूटरी, थायरॉइड, पैराथायरॉइड, एड्रिनल, लीवर, पैंक्रियाज, ओवरी आदि ग्रंथियों के स्रव को संतुलित करने में मदद करता है। 
  • शरीर के सभी संस्थान, रक्त संचरण, श्वास, पाचन, उत्सर्जन, नाड़ी तथा ग्रंथियों को क्रियाशील एवं सशक्त करता है।
  • पाचन सम्बन्धी समस्याओं, अपच, कब्ज, बदहजमी, गैस, अफारे तथा भूख न लगने जैसी समस्याओं के समाधान में बहुत ही उपयोगी भूमिका निभाता है।
  • वात, पित्त तथा कफ को संतुलित करने में मदद करता है। त्रिदोष निवारण में मदद करता है।
  • इसके अभ्यास से रक्त संचालन तीव्र होता है तथा चयापचय की गति बढ़ जाती है, जिससे शरीर के सभी अंग सशक्त तथा क्रियाशील होते हैं।
  • इसके नियमित अभ्यास से मोटापे को दूर किया जा सकता है और इससे दूर रहा भी जा सकता है।
  • इसका नियमित अभ्यास करने वाले व्यक्ति को हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, निम्न रक्तचाप, मधुमेह, गठिया, कब्ज जैसी समस्याओं के होने की आशंका बेहद कम हो जाती है।
  • मानसिक तनाव, अवसाद, एंग्जायटी आदि के निदान के साथ क्रोध, चिड़चिड़ापन तथा भय का भी निवारण करता है।
  • रीढ़ की सभी वर्टिब्रा को लचीला, स्वस्थ एवं पुष्ट करता है।
  • पैरों एवं भुजाओं की मांसपेशियों को सशक्त करता है। सीने को विकसित करता है।
  • शरीर की अतिरिक्त चर्बी को घटाता है।
  • स्मरणशक्ति तथा आत्मशक्ति में वृद्धि करता है।

सूर्य नमस्कार के आसन कौन कौन से हैं ?


  1. प्रणामासन
  2. हस्त उत्तानासन
  3. उत्तानासन
  4. अश्व संचालनासन
  5. चतुरंग दंडासन
  6. अष्टांग नमस्कार
  7. भुजंगासन
  8. अधोमुक्त श्वानासन/पर्वतासन
  9. अश्व संचालनासन
  10. उत्तानासन
  11. हस्त उत्तानासन
  12. प्रणामासन

सूर्य-नमस्कार कैसे करें ?

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सूर्य नमस्कार का अभ्यास बारह स्थितियों में किया जाता है, जो निम्नलिखित है-
(1) दोनों हाथों को जोड़कर सीधे खड़े हों। नेत्र बंद करें। ध्यान 'आज्ञा चक्र' पर केंद्रित करके 'सूर्य' का आह्वान 'ॐ मित्राय नमः' मंत्र के द्वारा करें।
(2) श्वास भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं। ध्यान को गर्दन के पीछे 'विशुद्धि चक्र' पर केन्द्रित करें।
(3) तीसरी स्थिति में श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकाएं। हाथ गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएं-बाएं पृथ्वी का स्पर्श करें। घुटने सीधे रहें। माथा घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे 'मणिपूरक चक्र' पर केन्द्रित करते हुए कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें। कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न करें।
(4) इसी स्थिति में श्वास को भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाएं। छाती को खींचकर आगे की ओर तानें। गर्दन को अधिक पीछे की ओर झुकाएं। टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव और पैर का पंजा खड़ा हुआ। इस स्थिति में कुछ समय रुकें। ध्यान को 'स्वाधिष्ठान' अथवा 'विशुद्धि चक्र' पर ले जाएँ। मुखाकृति सामान्य रखें।
(5) श्वास को धीरे-धीरे बाहर निष्कासित करते हुए दाएं पैर को भी पीछे ले जाएं। दोनों पैरों की एड़ियां परस्पर मिली हुई हों। पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें। नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं। गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाएं। ध्यान 'सहस्रार चक्र' पर केन्द्रित करने का अभ्यास करें।
(6) श्वास भरते हुए शरीर को पृथ्वी के समानांतर, सीधा साष्टांग दण्डवत करें और पहले घुटने, छाती और माथा पृथ्वी पर लगा दें। नितम्बों को थोड़ा ऊपर उठा दें। श्वास छोड़ दें। ध्यान को 'अनाहत चक्र' पर टिका दें। श्वास की गति सामान्य करें।
(7) इस स्थिति में धीरे-धीरे श्वास को भरते हुए छाती को आगे की ओर खींचते हुए हाथों को सीधे कर दें। गर्दन को पीछे की ओर ले जाएं। घुटने पृथ्वी का स्पर्श करते हुए तथा पैरों के पंजे खड़े रहें। मूलाधार को खींचकर वहीं ध्यान को टिका दें।
(8) श्वास को धीरे-धीरे बाहर निष्कासित करते हुए दाएं पैर को भी पीछे ले जाएं। दोनों पैरों की एड़ियां परस्पर मिली हुई हों। पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें। नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं। गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाएं। ध्यान 'सहस्रार चक्र' पर केन्द्रित करने का अभ्यास करें।
(9) इसी स्थिति में श्वास को भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाएं। छाती को खींचकर आगे की ओर तानें। गर्दन को अधिक पीछे की ओर झुकाएं। टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव और पैर का पंजा खड़ा हुआ। इस स्थिति में कुछ समय रुकें। ध्यान को 'स्वाधिष्ठान' अथवा 'विशुद्धि चक्र' पर ले जाएँ। मुखाकृति सामान्य रखें।
(10) तीसरी स्थिति में श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकाएं। हाथ गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएं-बाएं पृथ्वी का स्पर्श करें। घुटने सीधे रहें। माथा घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे 'मणिपूरक चक्र' पर केन्द्रित करते हुए कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें। कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न करें।
(11) श्वास भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं। ध्यान को गर्दन के पीछे 'विशुद्धि चक्र' पर केन्द्रित करें।
(12) यह स्थिति - पहली स्थिति की भाँति रहेगी।


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